Dr.Gunjarika Ranka – Beyond Within https://beyondwithin.gunjarikaranka.com Psychology, Mindfulness & Inner Growth Mon, 24 Aug 2026 05:32:55 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1 साँसों से बंधी हैं सुकून की डोर https://beyondwithin.gunjarikaranka.com/2020/11/01/saanso-se-bandhi-hai-sukoon-ki-dor/ https://beyondwithin.gunjarikaranka.com/2020/11/01/saanso-se-bandhi-hai-sukoon-ki-dor/#respond Sat, 31 Oct 2020 23:51:50 +0000 https://staging.gunjarikaranka.com/?p=612

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जीवन में आने वाली परिस्थितियों को दो श्रेणियों में रख सकते हैं एक वे, जब हमें प्रतीक्षा करनी होती हैं और दूसरी वे, जहाँ हमें निर्णय लेने होते हैं घड़ियाँ प्रतीक्षा की हो या निर्णय की, दोनों में ही मन का स्थिर और शांत रहना बहुत जरुरी हैं। धैर्य के बिना की गयी प्रतीक्षा, और विवेक के बिना लिए गए निर्णय, दोनों ही नुकसानदेह साबित होते हैं! यानि हर परिस्थिति का सामना करना के लिए हमें मन को स्थिर और शांत बने रहने की ट्रेनिंग देनी हैं। कैसे दें? 

यहाँ एंट्री होती हैं साँसों की। हमें ये ट्रेनिंग डायरेक्ट मन को देनी ही नहीं हैं। ये ट्रेनिंग हम अपनी साँसों को देंगे। एक बार अगर हम ने अपनी साँसों को संभाल लिया तो मन को वे अपने आप संभाल लेंगी। 

साँसों को सँभालने का मतलब हैं कि आपको ये दोनों काम अच्छी तरह से आने चाहिये :

1. साँसों का साक्षी होना 
2. और साँसों को नियंत्रित करना 

१. साँसों का साक्षी होना 

एक स्थान पर एकाग्र हो कर बैठ जाइये और अपनी साँसों को ध्यान से महसूस कीजिये। जैसे भी वे आ रही हैं, उनके आने जाने के तरीके, लय या स्पीड को बदलने की कोशिश मत कीजिये। सिर्फ देखिये — जो हो रहा हैं — उसे सिर्र्फ देखिये। 

ये ऐसी हैं तो इसका क्या मतलब हैं — ये भी मत सोचिये 

न कोई तुलना न कोई निष्कर्ष, न कोई विश्लेषण, कुछ नहीं सोचना सिर्फ ऑब्ज़र्व करना हैं। 

यह ध्यान की अवस्था हैं, इसमें आपके “करने” के लिए कुछ नहीं होता। आप बस शांति से, सौम्यता से देख रहे होते हैं। 

यह विधि आपकी एकाग्रता को बढ़ाती हैं। यह तकनीक हमें धैर्य से प्रतीक्षा करने की ट्रेनिंग देगी। 

2. कॉन्ससियस ब्रीथिंग यानि सजग ध्यान :

अब आपको अपनी साँसों का सिर्फ साक्षी नहीं रहना हैं बल्कि इस प्रक्रिया में actively participate करना हैं। अब आप दर्शक की नहीं बल्कि सूत्रधार की भूमिका में हैं। 

Conscious Breathing यानि, अब आप एक निश्चित तरीके से अपनी साँसों को नियंत्रित करेंगे, उन्हें एक दिशा देंगे.

 कॉन्सेसियस ब्रीथिंग के द्वारा हम साँसों के Therapeutic Zone में प्रविष्ट होते हैं। 

Therapeutic Zone यानि वह स्थिति जिसमें आपके मन और शरीर का रूपान्तरण (Transformation) शुरू होता हैं। अवस्था में एक मिनट में ली जाने वाली साँसों की गिनती चार से आठ के बीच रखनी होती हैं। हम इस में से 6 सांस प्रति मिनट चुन लेते हैं और प्रैक्टिस शुरू करते हैं। इस दर से सांस लेना यानि सांस अंदर लेने में 5 सेकंड लगेंगे और अगले 5 सेकंड में सांस बाहर छोड़नी हैं। 

अगर आपको लगे के पांच सेकण्ड्स बहुत ज्यादा है और आप इतनी देर तक सांस नहीं ले पा रहें है तो आप इन सेकण्ड्स को कम कर सकते हैं, 5 की बजाय 4 सेकण्ड्स की अवधि में सांस अंदर लेने और अगले चार सेकण्ड्स में सांस बाहर छोड़ने की प्रैक्टिस कीजिये। 

यह प्रैक्टिस 5 -7 मिनट तक कीजियेगा और फिर देखिये के कैसा महसूस होता हैं। आप कितना धीमे सांस ले सकते हैं अपनी ये क्षमता चेक करनी हैं पर खुद को स्ट्रेस में नहीं लाना हैं। और न ही साथ वाले के साथ किसी कम्पटीशन में जाना हैं। रोज प्रैक्टिस से आपकी अपनी क्षमता बढ़ती जाएगी। 

ये दोनों तरह की क्रियाएं किस वक़्त करनी हैं?

  1. सांस लेने की जो सक्रीय विधि हैं यानि जिसमें हमें एक मिनट में पांच-छह  सांस लेने की कोशिश करनी हैं, ये क्रिया आपको तब करनी हैं जब आप शांति से बैठ सकें, जब आपके आस पास कोई कोलाहल न हों. इसके लिए सुबह उठने के तुरंत बाद का और रात को सोने से जस्ट पहले का समय सर्वोत्तम है। 

2. साँसों का साक्षी होना वाली जो विधि हैं, उसे आपको अपने दिनचर्या के कामों के साथ जोड़ना हैं। 

  • जब आप चल रहें हैं तो अपनी साँसों अपर ध्यान दीजिये। देखिये आप चलते समय कैसे सांस लेते हैं – बस ऑब्ज़र्व करना हैं – साक्षी होना हैं। 
  • चलते समय अपनी साँसों के साथ कदम ताल मिलाने की कोशिश कीजिये। 
  • कभी जब आप म्यूजिक सु  रहें हों, तो ऑब्ज़र्व कीजिये आपकी साँसे कैसे चल रहीं हैं ? चैक कीजिये क्या गाने के मूड के हिसाब से आपकी साँसों का पैटर्न बदलता हैं ? 
  • कभी जब आप ट्रैफिक जैम में फंसे हों तो अपनी साँसों को नोटिस कीजिये वे कैसे आ जा रहीं हैं ? 
  • अगर आज कोई आपको भला बुरा कह गया हैं , आप विचलित हैं तो चेक कीजिये के साँसे कैसे आ जा रही हैं ,
  • आपको किसी पर बहुत गुस्सा आया हैं, आप विचलित हैं तो चैक कीजिये 
  • अगर आज आपकी तारीफ हुई हैं, आप बहुत खुश हैं तो चेक कीजिये के साँसे कैसे आ जा रहीं हैं 
  • आपको किसी पर बहुत प्यार आ रहा हैं, तो चेक कीजिये .

इन सभी मौकों पर आप पाएंगे के साँसे एक लय में नहीं हैं !!

इन सभी मौकों पर— जब भी, आप पाएं के साँसे लय में नहीं हैं तो अपनी साँसों को नियंत्रित करने का अभ्यास कीजिये. 

यह अभ्यास आपके मन की बागडोर को भावनाओं के हाथों में जाने से रोकेगा

जैसे ही हम कुछ महसूस करते हैं, हार्मोन्स एक्टिव हो जाते हैं भावनाओं का तेज प्रवाह सब कुछ खुद में समा लेने को आगे बढ़ता हैं, 

साँसे अपनी लय खोने लगतीं हैं, और दिमाग में सब अस्त व्यस्त हो जाता हैं .

ठीक इसी समय, अगर आपने अपनी साँसों को नियंत्रित कर लिया तो ये लयबद्ध साँसे आपके मन की बागडोर को थाम लेंगी और आपकी चेतना को, आपकी निर्णय क्षमता को पूरी सुरक्षा के साथ विवेक के पास पहुंचा देंगी। 

विवेक यानि वैचारिक स्पष्टता ! 

विवेक यानि वह स्थिति जब दिमाग की टेबल पर सारी फाइल्स बिलकुल अरेंज्ड रखी हों और दिमाग उन सबका इस्तेमाल कर पाए.

  • इनमें से एक फाइल होती हैं आपके अब तक के अर्जित ज्ञान की 
  • एक फाइल होती हैं आपके निजी अनुभवों की 
  • एक फाइल होती हैं इस समय महसूस हो रही भावनाओं की 
  • एक फाइल होती हैं “आज की परिस्थिति” और उन “पिछले अनुभवों वाली परिस्थिति” में अंतर दिखाने वाली (ताकि आप पूर्वाग्रहों से ग्रसित न हों जाएँ)

ऐसी ही कई छोटी बड़ी लेकिन महत्वपूर्ण जानकारियों वाली फाइल्स दिमाग देख पाता हैं और सबका पक्ष देख समझ कर सही निर्णय ले पाता हैं। 

दिमाग के इस ऑफिस को सुव्यवस्थित करने का, इसे सुव्यवस्थित “रखने” का काम करती हैं आपकी संतुलित और लयबद्ध साँसे। 

साँसों को साक्षी हो कर देखना और सक्रीय हो कर रेगुलेट करना — ये दोनों अभ्यास आपको जीवन की उन दोनों परिस्थितयों के लिए तैयार करते हैं, जिनकी बात हमने शुरू में की थी. 

जब आप सक्रीय हो कर अपनी साँसों को होल्ड करना सीखते हैं तो वस्तुतः आप अपने मन को धैर्य की ट्रेनिंग दे रहे होते हैं। 

  • आप उसे ठहरना सीखा रहें होते हैं 
  • आप उसे ठहराव के वक़्त “शांत” रहना सीखा रहें होते हैं 
  • आपका मन यह अनुभव कर पाता हैं के ठहराव में आकुलता नहीं, आनंद हैं ! 

अब, जब जीवन में— ठहरने की, प्रतीक्षा करने की स्थिति आएँगी तो उसे ये कला आती होगी क्योंकि आप उसे सीखा चुके होंगे ! 

जब आप काम करते समय साँसों का साक्षी रहने का अभ्यास  करते हैं तो आप कर्म करते समय “तटस्थ रहने का अभ्यास” करते हैं। यानि जब आप परिस्थति का सामना कर रहें हों , जब आप पर उस परिस्थिति में शामिल रहने का दबाव हो, जब आप पर जिम्मेदारी हों उस समय, वह काम करते हुए भी उस स्थिति से अलग हट कर कैसे सोचना हैं — आप ये ट्रेनिंग अपने मन को देते हैं। 

“स्थितप्रज्ञता” ये शब्द सुना हैं न। स्थिति में होते हुए अपनी प्रज्ञा को जागृत रखना। प्रज्ञा यानि विवेक। यहीं से होती हैं स्थितप्रज्ञ बनने की शुरआत. 

साँसों को साक्षी हो कर देखना और सक्रीय हो कर रेगुलेट करना — ये दोनों अभ्यास आपको हर रोज करने हैं !  

जैसे आप रोज दांत ब्रश करते हैं, दो चार दिन दांत ब्रश कर लिए हैं अब महीने दो महीने की छुट्टी!! ऐसा हम नहीं सोचते न क्योंकि हमें पता हैं के सही डेंटल केयर का मतलब हैं रोज ब्रश करना! ऐसे ही सही मेन्टल केयर का मतलब हैं रोज मैडिटेशन करना! डेंटल केयर आपकी मुस्कराहट को खूबसूरत बनाती हैं और मेन्टल केयर आपके मन की मुस्कुराहटें बनाये रखती हैं!

आप अपनी साँसों पर कितना नियंत्रण रख पाते है यही तय करेगा के आप अपनी जिंदगी पर कितना नियंत्रण रख पाएंगे। जैसे आपकी साँसे चलेंगी वैसी ही आपकी जिंदगी चलेगी।

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DeCode Breathing Episode 2
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जानिये अपनी साँसों का हाल चाल https://beyondwithin.gunjarikaranka.com/2020/09/01/janiye-apni-saanso-ka-haal-chaal/ https://beyondwithin.gunjarikaranka.com/2020/09/01/janiye-apni-saanso-ka-haal-chaal/#respond Tue, 01 Sep 2020 13:09:41 +0000 https://staging.gunjarikaranka.com/?p=282

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जिंदगी वैसी होती हैं जैसा हमारा मन उसे महसूस करता हैं। परिस्थितियाँ हमारे नियन्त्रण में नहीं होती पर उन पर प्रतिक्रिया देने वाला मन हमारे नियंत्रण में हो सकता हैं। मन को वश में करने का मतलब ये नहीं हैं के उस से कुछ भी महसूस करने के अधिकार छीन लिए जाएँ, उसे रूखा सा कर के रख दें बल्कि मन को वश में करने का मतलब होता हैं उसे ट्रांसफॉर्म करना, रूपान्तरित करना, यानी उसकी प्रोग्रामिंग को बदल कर उसे मजबूत बनाना।

और ये जो साँसें आप ले रहे हैं न यही हैं आपके मन की इंजीनियर! जो सारी coding को बदल के रख देगी।

जीवन की बागडोर अपने हाथों में चाहिए तो ये तीन स्किल्स सीखने होंगे :

पहला – बिना दखल दिए, जो हो रहा हैं उसे सिर्फ “देखना” जैसे परीक्षा के समय टीचर करते हैं ! स्टूडेंट सही लिखे, गलत लिखे, वे नहीं टोकते वे बस देखते हैं , कोई दखल नहीं देते — जानते हैं के क्या हो रहा हैं कड़ी नज़र रखते हैं पर दखल नहीं देते।यह — दखल दिए बिना सजग रह कर ऑब्ज़र्व करने की क्वालिटी पहला स्किल हैं jo hame aana chahiye.

दूसरा स्किल – रिलैक्स होना सीखना हैं: रिलैक्स होने का मतलब समझते हैं न आप? अक्सर हम कहते हैं ये काम निपटा लें तो रिलैक्स करेंगे, यानी किसी जिम्मेदारी का पूर्ण हो जाना,  जब तक वह काम अधूरा हैं तब तक उस से जुड़े विचार हमें अलर्ट मोड पर रखते हैं और जब वह पूरा हो जाता हैं तो हमारा दिमाग उस से जुड़े विचारों को किसी नीचे के स्टोर में डाल देता हैं। यानी उन विचारों से कॉन्ससियस माइंड को मुक्त कर लेता हैं। रिलैक्स होना मतलब  चेतना को उन विचारों से फ्री कर लेना, उन्हें छोड़ देना, जाने देना।।। let go . यही “let go” का एहसास जो अभी तक किसी जिम्मेदारी के पूरा होने पर होता हैं इसी एहसास को एक स्किल की तरह सीखना हैं। ताकि अपनी इच्छा से इसका प्रयोग किया जा सके।

तीसरा स्किल हैं – नियंत्रण स्थापित करने का स्किल : यानि अपनी ऊर्जा को अपने नियंत्रण में ले लेना और फिर तय करना कब कहाँ कैसे कितनी प्रयोग करनी हैं।

ये तीनों स्किल सीखने के लिए अब चलते हैं ट्रेनिंग academy में ब्रीथिंग अकडेमी में 🙂   

हमारे शरीर में ब्रीथिंग सिस्टम अपनी पूरी कैपेसिटी के साथ काम नहीं कर रहा हैं. हमें साँस लेने की अपनी आदतों और तरीकों को बदलने की जरुरत हैं

एक बार अगर ब्रीथिंग सिस्टम अपने ऑप्टीमल लेवल पर काम करने लगे तो हमारी साँसे अपने आप में एक therapeutic tool में तब्दील हो जाती हैं यानी आपके हर मर्ज की दवा !

साँसों और शरीर के ऑर्गन्स के बीच तालमेल हो जाये तो ये दोनों मिल कर मन के हर रोग को ठीक कर देते हैं

और साँसों और मन के बीच तालमेल हो जाये तो ये दोनों मिल कर शरीर के हर रोग को ठीक कर देते हैं।

यानि साँसे, शरीर के ऑर्गन्स और मन, इन तीनों के बीच का कोऑर्डिनेशन हो तो डायबिटीज, ब्लड प्रेशर के शारीरिक रोग हों या attitude, इमोशंस, बिहेवियर सब पर काम किया जा सकता हैं।

तो शुरू करें काम?

आज का पहला लेसन ये हैं: अभी आप कैसे साँस ले रहे हैं, ये चेक कीजिये

एक हाथ अपने सीने पर रखिये और एक हाथ अपने पेट पर रखिये और अपनी साँसों को महसूस कीजिये। जब आप सांस अंदर लेते हैं तो आपको किस हाथ के नीचे स्पंदन महसूस होता हैं? इस से पता चलेगा के आप चेस्ट ब्रीथिंग करते हैं या बेली ब्रीथिंग.

चेक कीजिये के क्या आपकी साँसे जल्दी जल्दी आती हैं या लम्बी और गहरी महसूस हो रहीं हैं ?

चेक कीजिये के क्या आपकी साँसे एक लय में आती हैं या कभी छोटी कभी बड़ी अनियमित सी रहतीं हैं ?

अगर आप एक स्वस्थ व्यक्ति हैं तो आपका अपनी साँसों पर इतना नियंत्रण होना चाहिये के आप चाहें तो साँसों को इतना धीरे धीरे लें के एक मिनट में चार पांच साँसे ही हो और आप चाहें तो इतनी फटाफट लें के एक मिनट में 120 से भी ज्यादा बार ले सकें।

कर के देखिये, अगर आप ये दोनों तरीके से साँसे ले सकते हैं यानि आपके लंग्स अभी स्वस्थ हैं और हमें सिर्फ इनको सही तरीके से सांस लेने की ट्रेनिंग देनी हैं.

सांस लेने के यूँ तो कई तरीके हैं पर दो बहुत ही जरुरी तरीके हैं जिन पर मास्टरी हाँसिल करना जरूरी हैं। इन दोनों तरीकों पर हम अगले आर्टिकल में बात करेंगे।

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DeCode Breathing Episode 1
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सम्भालिये अपने अंदर के मौसम को https://beyondwithin.gunjarikaranka.com/2020/08/01/sambhaliye-apne-andar-ke-mousam-ko/ https://beyondwithin.gunjarikaranka.com/2020/08/01/sambhaliye-apne-andar-ke-mousam-ko/#respond Sat, 01 Aug 2020 00:28:12 +0000 https://staging.gunjarikaranka.com/?p=600

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मन की दोनों टीमों भावनाओं और तर्कबुद्धि के बीच का अंतर्द्वंद सिर्फ अनिर्णय की अवस्था ही नहीं देता, अनचाहे निर्णय लेने को बाध्य भी करता हैं. इसका असर सिर्फ हमारी भावनाओ पर ही नहीं पड़ता बल्कि शरीर के अंदर का पूरा मौसम इसकी चपेट में आता है. 

क्या हैं शरीर के अंदर का मौसम?

इस मौसम को बनाये रखने के लिए हमारे शरीर के सारे ऑर्गन्स मिल कर काम करते हैं। हमारे शरीर के सभी अंगों को एक निश्चित तरह से काम करने के लिए प्रोग्राम्ड किया गया हैं, और जब वे इस सेट प्रोग्रामिंग के तहत काम करते हैं तो शरीर के भीतर का मौसम संतुलित बना रहता हैं। 

शरीर के अंदर का मौसम संतुलित रहना यानी:

  • शरीर का एक निश्चित तापमान पर बना रहना 
  • खून में ग्लूकोस की एक निश्चित मात्रा बने रहना
  • एक मिनट में हमारे दिल का एक निश्चित बार धड़कना 
  • रक्त का एक निश्चित दबाव पर बहना यानी ब्लड प्रेशर मेन्टेन रहना 

ये और ऐसी ही कई और चीजे जब एक निश्चित रेंज में रहती हैं तो बॉडी का मौसम स्टेबल बना रहता हैं, लेकिन!! अंदर के मौसम को बनाये रखने से भी ज्यादा जरूरी एक और काम हैं जो टॉप प्रायोरिटी पर रखा जाता हैं और वो हैं “सुरक्षित रहना”

प्रकृति ने हमारे शरीर की प्रोग्रामिंग में सब से क्रिटिकल मुद्दा “सुरक्षा” को रखा हैं। शरीर के अंगों को निर्देश हैं के सबसे सबसे पहले खुद को सुरक्षित रखने का काम देखना बाकि मौसम वगैरह तो बाद में भी ठीक कर लेंगे। हर जीव की पहली चिंता होती हैं खुद को सुरक्षित रखना।

देखा हैं न जानवरों में, थोड़ी भी आहट हो तो चिड़िया फुर्र से उड़ जाती हैं, कुत्ते के कान कैसे खड़े हो जाते हैं, हिरणों के झुण्ड कैसे चौकन्ने रहते हैं, अगर आप भी अकेले किसी सूने रास्ते पर से गुजर रहें हैं… अँधेरा घिरने लगा हैं तो आपकी चाल में एक अलग तेजी आ जाएगी… आपके कान और आँखें अधिक चौकन्ने हो जायेंगे। 

और अगर, ऐसे में आपको यह आभास हो गया के कोई पीछे आ रहा हैं तो!!

  • आपकी सुरक्षा के लिए हर अंग अपने उस निश्चित मौसम को डिस्टर्ब कर लेता है यानि 
  • पैन्क्रीअस आपके रक्त में ज्यादा ग्लूकोस छोड़ देगा ताकि आपको तेज चलने के लिए एक्स्ट्रा एनर्जी मिल सके, आपके फेंफड़े साँसे लेने छोड़ने का काम तेजी से करने लगेंगे। 
  • हार्ट जल्दी ब्लड की पम्पिंग करने लगेगा ताकि अगर दौड़ना या लड़ना पड़े तो कोशिकाओं को खून की कमी न हो जाए, बेशक इस कवायद में आपका ब्लड प्रेशर बढ़ जायेगा। 
  • आपके दिल की धड़कन बढ़ जाएगी
  • इस चककर में साँसे छोटी हो जाएँगी और घबराहट बढ़ जाएगी।  

इंसानी दिमाग का सबसे आधारभूत सिस्टम आज भी आदिम युग जैसा ही हैं, और खतरा महसूस होने पर यह अपना मूलभूत रिएक्शन वही रखता हैं चाहे खतरा फिजिकल हो या मेन्टल। यानि आपके भय का कारण ये भी हो सकता हैं की कोई पीछा कर रहा हैं और अब बचने के दो ही तरीके हैं या तो भागो या फिर लड़ो। आपकी घबराहट का कारण यह भी हो सकता हैं के आपको किसी challenging स्थिति का सामना करना हैं चाहे इंटरव्यू, चाहे किसी बहस में खुद को सही साबित करना।

दिमाग का मूलभूत ढांचा इसे ठीक वैसे ही लेता है जैसे फिजिकल खतरे को लेता हैं। उसे बस इतना मतलब हैं के किसी अनचाही परिस्थिति का सामना करने की नौबत आ गयी हैं और वह उस “भागो या लड़ो” वाले बटन को ऑन कर देता हैं, इस बटन के ऑन होते ही शरीर के सारे अंगों को मैसेज चला जाता हैं के भई सेफ्टी इश्यूज आ गए हैं, हमे बाहरी खतरे से निपटना हैं और

ब्लड में शुगर लेवल बढ़ना चालू हो जाता हैं, हार्ट भी तेजी से ब्लड पम्पिंग शुरू कर देता हैं… ब्लड प्रेशर शूट उप हो जाता हैं, लंग्स क्यों पीछे रहेंगे? वे साँसे तेज-तेज लेने लगते है भले ही टूटी फूटी जैसी भी, जितनी भी आये। जब साँसे पूरी नहीं ली तो ब्रेन में ऑक्सीजन लेवल गड़बड़ाने लगता है और आपने अपने प्रेजेंटेशन के लिए अपने विचारों का जो सिस्टेमेटिक ढांचा आपने तैयार किया था वो सारे व्यवस्थित विचार उथल पुथल से हो जाते हैं। जैसे किसी तारों के किसी व्यवस्थित सर्किट में तार इधर उधर बेतरतीबी से जुड़ जाएँ तो शार्ट सर्किट हो जाता हैं। वैसा ही कुछ दिमाग में हो जाता हैं क्या कहना था भूल जाते हैं, जुबान लड़खड़ा जाती हैं हम कहते हैं “नर्वस हो गए” 

दिमाग के इस सर्किट के सारे वायर्स को अपनी जगह दुरुस्त करने के लिए आपको चाहिए चंद लम्बी गहरी साँसे। बस ! 

इस “लड़ो या भागो” वाले बटन को रेगुलेट करना बहुत जरुरी होता हैं ताकि भावनाओं और तर्कबुद्धि (emotions & logics) के बीच ये जो शॉर्ट सर्किट वाली चिंगारिया हैं उन्हें रोका जा सके और विवेक आ कर मामला संभाल ले, और आप अपनी बेस्ट परफॉरमेंस दे पाएं, सही निर्णय लें पाएं।  

एक सच यह भी हैं के रोज तनाव में रह रह कर हमने तनाव को एक प्रतिक्रिया की बजाय अपने शरीर का स्थायी मौसम बना लिया हैं। जब कोई वास्तविक समस्या नहीं होती तब भी हम पूर्व (past) में हो चुकी बातों की जुगाली शुरू कर देते हैं। या फ्यूचर प्लानिंग के नाम पर आशंकाओं में डुबकियाँ लगाने लगते हैं। यह सब हम बाक़ायदा पूरी भावुकता के साथ सोचते हैं। यानि जो बीत गयी उन घटनाओं को याद कर के अभी भी वही दुःख, वही गुस्सा, वही नाराजगी या वही ग्लानि महसूस करते हैं जो तब हुई थी। भविष्य में क्या बुरा हो सकता हैं वो सब भी पूरी भावुकता के साथ सोचते हैं। जहाँ आपके विचारों को भावनाओं का साथ मिला! वहीँ दिमाग उसे “वास्तव में कुछ गलत” हो रहा हैं की तरह रजिस्टर करता हैं दिमाग के लिए “कुछ गलत” का एक ही मतलब हैं “खतरा” और खतरा हैं यानि “लड़ो या भागो वाला बटन” ऑन करना होगा और वह ऑन कर देता हैं! इसके ऑन होते ही शरीर के सारे सिस्टम्स इमरजेंसी मोड पर आ जाते हैं। 

यानि आपने ऐसी बातों को सिर्फ “सोचा” जो फ़िलहाल आपकी समस्या हैं ही नहीं, और आपकी बॉडी आपकी उस काल्पनिक समस्या पर भी उसी तरफ रियेक्ट करने लगती हैं मानों वह सच में हो रहा हो! 

अब सोचिये के अगर इस तरह से सोचना आपकी आदत हैं, तो आपका दिमाग आपको “खतरे में” ही मान रहा हैं और आपकी बॉडी के ऑर्गन्स ज्यादातर टाइम इमरजेंसी मोड पर ही रहते हैं यानि, 

हमेशा ही ग्लूकोस ज्यादा बनती रहेगी… 

हमेशा ही हार्ट ज्यादा पम्पिंग करता रहेगा… 

हमेशा ही लंग्स जल्दी जल्दी साँसे लेने के लिए छोटी छोटी साँसे ेते रहेंगे… 

हमेशा ही आपके दिमाग के तंतुओं को ऑक्सीजन कम मिलती रहेगी… 

हमेशा ही आप नर्वस सा फील करते रहेंगे… तो आ गया न आपके शरीर के मौसम में तूफान! 

और सिर्फ आ ही नहीं गया, अंदर ही रच बस भी गया। क्योंकि सारे ऑर्गन्स को इमरजेंसी मोड पर रहने की आदत हो गयी. अब उनको नोर्मल्ली काम करवाने के लिए दवाइयाँ लेनी पड़ती हैं। ये दवाएँ इन अंदरूनी अंगों पर दबाव बनातीं हैं के वे कम ग्लूकोस बनाये या जरा हौले-हौले धड़के… लेकिन आप अपनी आदतें नहीं बदलते और अपने विचारों में भावनाओं का जूस मिला कर एक से एक बुरी बात की जुगाली चालू रखते हैं। 

नतीजा? एक तरफ, आपका दिमाग आपके शरीर को लगातार इमरजेंसी मोड पर रहने के निर्देश देता रहता हैं, दूसरी तरफ दवाएँ ऑर्गन्स को मजबूर करती रहती हैं के इमरजेंसी मोड पर न आएं! आप समझ रहें है न कैसा भयानक खिलवाड़ चल रहा होता हैं आपके सारे ऑर्गन्स के साथ?? फिर आप कहते हैं साइड इफेक्ट्स होते है दवाइयों से। वाकई? सिर्फ दवाओं के साइड इफेक्ट्स है सारे? इस सारे गड़बड़झाले का असली डॉन हैं हमारी-अपनी-सोच। 

सोचना बुरी बात नहीं हैं, यही क्वालिटी तो हमें सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ प्रजाति बनाती हैं पर इस क्वालिटी का उपयोग करना इस प्रजाति हर व्यक्ति को आता नहीं हैं और यही क्वालिटी आत्मघाती बन जाती हैं। 

यहाँ सबसे पहली भूमिका हमारी श्वासों की आती हैं। लम्बी गहरी श्वासों पर किया गया मैडिटेशन आपका पहला तारणहार हैं। यही हैं जो आपके दिमाग के उस इमरजेंसी मोड को ऑफ करता हैं और सारे ऑर्गन्स अपने सामान्य तरीके पर लौट आते हैं. 

अगर आप परेशान नहीं हैं और आपके पास समय हैं तो दस मिनट श्वासों पर ध्यान कीजिये और अगर आप तनाव में है बहुत व्यस्त हैं तो यही मैडिटेशन हर रोज बीस मिनट कीजिये क्योंकि इस समय आपको इसकी ज्यादा जरुरत हैं ! ये कैसे करना हैं और साँसे कैसे मददगार साबित होंगी इस बारे में अगले आर्टिकल में बात करेंगे 🙂

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DeCode Mind Episode 5
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कहाँ से हो कर जाता हैं “विवेक” का रास्ता https://beyondwithin.gunjarikaranka.com/2020/07/01/kaha-se-ho-kar-jata-hai-vivek-ka-rasta/ https://beyondwithin.gunjarikaranka.com/2020/07/01/kaha-se-ho-kar-jata-hai-vivek-ka-rasta/#comments Wed, 01 Jul 2020 00:01:11 +0000 https://staging.gunjarikaranka.com/?p=591

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पिछले आर्टिकल (मिलिये मन के बॉस से) में हमने जाना के मन की दोनों टीमों भावनाओं और तर्क बुद्धि के बीच जब अन्तर्द्वन्द छिड़ जाये तो मामला इन के सुपर बॉस विवेक यानी wisdom के हाथ में सौंप देना चाहिये। लेकिन विवेक तक पहुँचना इतना सरल…सहज नहीं हैं। 

हम विवेक तक पहुँचाने वाली उस ख़ुफ़िया व्यवस्था के बारे में जाने इस से पहले यह जान लीजिये के विवेक कोई चमत्कारी शक्ति नहीं है जो अचानक से प्रकट होती हैं और सब संभाल लेती हैं। 

विवेक यानी स्थिर चित्त/ स्टेबल माइंड 

एक स्थिर चित्त अपने सारे रीसॉर्सेज़ का इस्तेमाल बेहतर तरीक़े से कर सकता है। आपके रीसॉर्सेज़ यानी आपकी knowledge, आपके अब तक के अर्जित अनुभव, वो सारे skills जो आपके सीखे है, सही और ग़लत को पहचान सकने की आपकी क़ाबलियत। 

ये सब आपके रीसॉर्सेज़ है। 

लेकिन किसी भी तरह के अंतर्द्वंद में फँसा मन “व्याकुल” अवस्था में होता है और ऐसे में वह वो सब भी नहीं सोच पाता जो उसे पहले से पता है। ये ठीक वैसा ही है जैसे आप हर रोज़ अपनी किचन में कुशलता से खाना बनाती है लेकिन किसी दिन अगर आप बहुत तनाव में है, या जल्दबाज़ी में काम करना पड़ रहा हो तो चाकू से आपकी अंगुली कट जाती है, या कड़ाही में गर्म तेल से अपना हाथ जला बैठती है। आपको ऑफ़िस के लिए देर हो रही है रास्ते में ट्रैफ़िक ज़्यादा है ज़रूरी मीटिंग शुरू होने वाली है… बरसों से गाड़ी चलाने वाले आप, रेड लाइट वाला सिग्नल देखने से चूक जाते है या किसी से टकरा जाते है! 

आप कुशल है, ये सब आपके अनाड़ी होने की निशानियाँ नहीं है ये आपके तनाव में होने की निशानियाँ है! ये आपके हड़बड़ी में होने की निशानियाँ है। 

परिवार में आप पर आक्षेप लगाये जा रहे है, आपके ख़िलाफ़ एक तरह से गुट-बन्दी हो गयी है आपकी बेचैनी बढ़ती जा रही है और आप जो कभी अनर्गल नहीं बोलते, आज आवेश में आ कर बहुत कुछ अनर्गल बोल जाते है। आपकी एक चूक से सब कुछ आपके ख़िलाफ़ चला जाता हैं। 

ये सारी स्थितियाँ वे थी जब चित्त को स्थिर रखने की ज़रूरत थी। यह समय संतुलन खोने का नहीं था। पर भावनाएँ विचलित थी, बुद्धि यह प्रमाणित करने में लगी थी मैं सही हूँ जब अंदर इतने तूफ़ान चल रहें हो तो कौन रखता मन को स्थिर? 

प्रकृति हमें यूँ डावाँडोल रहने के किए कैसे छोड़ देती? मन को उसकी स्थिरता लौटा देने का दायित्व प्रकृति में हमारे ही शरीर के एक सिस्टम को सौंपा है और इसका नाम है – श्वसन तन्त्र यानी respiratory system, वही, जिसका काम है साँस लेना। 

साँस तो अपने आप आती रहती है। ये इतना साधारण सा काम है के इस ओर कभी ध्यान ही नहीं जाता।

अगर आप ध्यान नहीं देंगे तो आपकी साँसे सिर्फ ऑक्सीजन और कार्बन डाई ऑक्साइड का आदान प्रदान करवाने का काम करती रहेंगी लेकिन, अगर, आप ध्यान देंगे तो ख़ुफ़िया दरवाजा खुल जायेगा ! दरवाजा जो आपको सीधे मन के सुपर बॉस यानि विवेक के पास ले जायेगा। 

हमारी ये आती जाती साँसे बहुत कमाल की चीज़ हैं! अपनी साँसों को साधारण मत समझिये। श्वास को साधने से कई रोग ठीक हो जाते हैं, प्राणायाम अपने आप में एक चिकित्सा पद्धति हैं। एक सामान्य व्यक्ति एक मिनट में 12-15 बार श्वास लेता हैं। बहुत स्ट्रेस में रहने वाले लोगों की श्वसन दर 15-20 साँसे प्रति मिनट हो सकती हैं। प्रति मिनट आप कितनी बार सांस लेते हैं यह बताता हैं के आपका चित्त कितना स्थिर हैं। आपकी श्वास जितनी लम्बी गहरी और लय में होगी आपके दिमाग की क्षमताएँ उतनी ही ज्यादा होंगी। यदि श्वास की लय पर नियंत्रण लाते हुए प्रति मिनट 12 से कम पर श्वास स्थिर हो जाये तो कई विलक्षण क्षमताएँ भी जागृत होने लगती हैं। 

योग साधना विज्ञानं कहता हैं के अगर इंसान अपनी श्वास दर को 11श्वास /मिनट पर ले आये तो वह अपने आस पास के पशु-पक्षियों द्वारा दिए जा रहे सिग्नल्स को समझने लगता हैं। अगर यह दर 9 श्वास/मिनट पर आ जाये तो वह इस धरती पर प्रकट हो रहे हर सिग्नल (मौसम, पेड़-पौधों से आ रहे सिग्नल्स को भी) समझने लगता हैं, और अगर यह दर 7 श्वास/मिनट हो जाये तो इस समूचे संसार के अस्तित्व में कुछ भी ऐसा शेष नहीं रहता जो आपसे छुपा रह सके! 

याद रखिये श्वास को जबरन धीमा करने से यह सब नहीं होने लगेगा क्योंकि आप हर समय इस पर ध्यान केंद्रित नहीं रख पाएंगे। प्राणायाम के जरिये आप अपनी श्वास दर को कुछ समय के लिए कुछ हद तक धीमा कर सकते हैं। एक लम्बे अभ्यास के बाद यह होगा के आपकी श्वसन दर स्वाभाविक रूप से धीमी होती जाएगी। प्राणायाम के लिए हर रोज निकाले गए दस मिनट भी, फिलहाल आप जिस स्थिति में हैं आपको उस से बहुत बेहतर स्थिति में ला सकते हैं। 

हमारी साँसे हमारे शरीर के अंदर के मौसम पर निर्भर करती हैं और हमारे शरीर का मौसम हमारी सांसों पर निर्भर करता हैं। आपको पता हैं हमारे शरीर के अंदर का भी एक मौसम होता हैं ?? होता हैं 🙂

और ये जो हमारी साँसे हैं ये भी एक तरह की हवाएँ ही हैं और हवाएँ बहुत तेज चलें तो मौसम बिगड़ जाया करते हैं और तूफान के आसार बन जाते है! शरीर के भीतर का ये मौसम कैसा हैं और इसमें आने वाले तूफानों को कैसे संभालना हैं इस पर अगले आर्टिकल में बात करेंगे 🙂

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पिछले आर्टिकल में हमने बात की कि मन बहुत महत्वपूर्ण होता हैं, इतना महत्वपूर्ण के शरीर के सारे अंग और सारे सिस्टम्स उस पर निर्भर करते हैं। लेकिन मन के अंतर्गत काम करने वाली भावनाओं की बटैलियन और तर्क-बुद्धि के बीच कभी-कभी ठन सी जाती हैं. यूँ तो ये दोनों मिल कर काम करते हैं पर कई बार एकमत नहीं हो पाते। 

जैसे मान लीजिये के अगर मेरे सामने कोई बात आएगी तो स्वाभाविक हैं की उस बात के लिए मेरी एक प्रतिक्रिया भी होगी। 

लेकिन, मेरे अंदर कौन हैं जो ये तय करेगा के क्या प्रतिक्रिया देनी हैं? 

  • गुस्सा करना हैं, हँस देना हैं…या नाराज हो कर चले जाना हैं 

कौन decide करता हैं ?? 

ये जो हमारी बॉडी हैं इसमें कई टीम्स हैं जो ये सारे काम देखतीं हैं। 

हमारे शरीर की तरफ से सबसे पहली प्रतिक्रिया देने वाली टीम भावनाओं की ही होती हैं। ये frontline पर खड़ी हुई टीम हैं। किसी भी परिस्थिति के आने पर सबसे पहले हमारी भावनाएं रियेक्ट करती हैं — यानि हम कुछ “महसूस करते हैं” लेकिन, हम उस पल जो कुछ भी महसूस करते हैं वो वैसा का वैसा बाहर जाहिर तो नहीं कर देते। बल्कि ये टीम मामले को ऊपर वाली टीम को ट्रांसफर करती हैं — ऊपर वाली टीम यानि “तर्क बुद्धि” 

भावनाओं की टीम जाएगी और कहेगी के, “देखों कैसे बात की गयी हैं हमसे। … बड़ा ही अपमान किया जा रहा हैं… क्या करें झगड़ा कर लें क्या?? 

फिर तर्क बुद्धि कहती हैं रुको, रुको जरा… पहले ये बताओ कौन कर रहा है अपमान? कहाँ पर कर रहा हैं? इस समय जवाब देने से फायदा हैं या नुकसान? हमारी छवि तो नहीं खराब हो जाएगी? बात सँभालने की जगह बिगड़ तो नहीं जाएगी!!!

ये सब देख-भाल कर तर्कबुद्धि तय करती हैं के क्या प्रतिक्रिया देनी चाहिए। 

अब कई बार भावनाएं इस निर्णय से सहमत होती हैं तो कई बार नहीं भी होती। 

कई बार भावनाएं इतने उबाल पर होती हैं के वे तर्कबुद्धि की बात सुनना ही नहीं चाहती तो कभी-कभी ठीक इसका उल्टा भी होता हैं। भावनाओं की टीम बहुत डरी हुई होती हैं तर्कबुद्धि उन्हें अपने लिए स्टैंड लेने को कहती हैं पर भावनाएँ साथ नहीं देती और प्रतिक्रिया को अपने हिसाब से बदल देती हैं। 

ऐसे में बुद्धि और भावनाओं के बीच अंतर्द्वंद शुरू हो जाता हैं। भावनाएँ यानि हार्मोन्स की बटालियन और तर्क बुद्धि यानि विचारों का एक पूरा जंजाल। जब भावनाएँ अपनी तरफ खींचती हो और तर्क बुद्धि अपनी तरफ. ऐसे में निर्णय कौन ले? यही समय है जब मामला सुपर बॉस के पास जाना चाहिए।

बुद्धि और भावनाओं — दोनों का बॉस! कौन हैं ये?

इस बॉस का नाम हैं “विवेक” विवेक यानि wisdom. 

भावनाएँ बस इतना जानती हैं के उन्हें “अभी क्या चाहिए”  जो अभी चाहिए बस वही सही हैं ! 

तर्क बुद्धि ये देखती हैं के “अपने लिए क्या सुरक्षित है” यानि जो अभी खुद को सुरक्षित रख सके, बस वही सही हैं। 

विवेक यानि विजडम यह देखता हैं के “क्या सही हैं ” as a whole. विवेक के पास दूर दृष्टि होती हैं — इसलिए विवेक वो भी देख पाता हैं जो ये दोनों नहीं देख पा रहे होते।

हो सकता है जो सही हो उसमें मन को मजा न आये, हो सकता है तर्क बुद्धि को लगे के इसमें तो बहुत मेंहनत लगेगी पर विवेक आपको वह सुझाएगा जो “आपको करना चाहिए” “जो आपके लिए वास्तव में सही हैं”, “वास्तव में जरूरी हैं ! “

इन तीनों के काम करने के तरीके को एक छोटी सी कहानी से समझते हैं। 

एक बार एक फैक्ट्री में कुछ मजदूर काम करते थे। गरीब मेहनती लोग थे। दिन भर काम करते और शाम को ठेकेदार के पास जा कर रजिस्टर में अंगूठा लगाते और अपनी दिहाड़ी ले लेते। 

एक दिन उन्हें पता चला के वे जितनी रकम पर अंगूठा लगाते हैं उतने पैसे तो ठेकेदार उनको देता ही नहीं हैं। उन्हें तो बहुत कम पैसे दिए जा रहे हैं। पता चलते ही सब मजदूरों में रोष फ़ैल गया ! कुछ जो बूढ़े मजदूर थे वे भाग्य को कोसने लगे के हाय हमको ही ऐसा बेईमान ठेकेदार मिलना था जो हमारे पैसे खा गया !!  हम तो गरीब लाचार लोग हैं ठेकेदार से कैसे लड़ सकते हैं! 

जो युवा वर्ग था वो बोला किस्मत को कोसने की क्या बात हैं! और कौन कहता है के हम कुछ कर नहीं सकते। ठेकेदार बेईमान हैं तो हम उसकी शिकायत करेंगे। हम अभी मैनेजर साहब के पास जाते हैं और उनसे कहते हैं के इस बेईमान ठेकेदार को नौकरी से निकाले और नया ठेकेदार लगाये। 

सब मजदूर पहुंचे मैनेजर से मिलने। बोले देखो साहब कैसा अन्याय हो रहा हैं, वो बेईमान ठेकेदार गरीबों का पैसा लूट रहा हैं। … मैनेजर ने शांति से उनकी पूरी बात सुनी और बोले, “ठीक हैं, अच्छा किया आपने मुझे सब बता दिया। अभी तो आप लोग अपने घर जाइये और शाम को भोजन वगैरह से फारिग हो कर साढ़े आठ बजे वापस फैक्ट्री आ जाइयेगा। आश्वस्त हो कर मजदूर घर लौट आये।

मजदूरों ने सोचा लगता हैं मैनेजर साहब हमारे सामने ही डाँट लगाएँगे ठेकेदार को, और उसको कहेंगे के हम सबसे माफ़ी मांगे। तभी तो हम सबको वापस  बुलाया हैं। पर सबने  तय लिया था के चाहे जो हो जाये हम ठेकेदार को माफ़ नहीं करेंगे। हम तो मैनेजर साहब को साफ़ साफ़ कह देंगे के ऐसे बेईमान ठेकेदार को तो आप नौकरी से निकालो ही। 

शाम को सब मजदूर ख़ुशी-ख़ुशी फैक्ट्री पहुँचे तो क्या देखते हैं के फैक्ट्री के आगे तेज रौशनी वाली लाइट्स लगी हुई हैं, फर्श पर दरियाँ बिछी हैं, दरियों पर बस्ते रखे हैं,  एक बड़ा सा ब्लैक बोर्ड लगा हैं और वहीँ एक लड़का खड़ा हैं जिसे मैनेजर साहब बातचीत कर रहें हैं। मजदूरों की नज़रे ठेकेदार को खोज रही थी जिसको अभी डाँट पड़ने वाली थी और जो अभी उनसे हाथ जोड़ कर माफ़ी माँगने वाला हैं और जिसकी माफ़ी को वे ठुकरा देने वाले हैं। तो वहां के सारे नज़ारे को नज़रअंदाज़ करते हुए वे लोग मैनेजर की और बढे। उनको देख कर मैनेजर साहब खुश हो गए बोले अरे आ गए आप लोग! आइये आपको इनसे मिलवाता हूँ। ये हैं आपके मास्टर जी। और आज से हर शाम एक घंटा ये आप लोगों को पढ़ाएंगे। 

पढ़ाएंगे!!! हमको !!! क्यों?? मजदूरों ने हैरान हो कर पुछा। 

मैनेजर साहब मुस्कुराये और बोले हाँजी आज से हर शाम आप लोगों की क्लास लगेगी। आप पढ़ना नहीं जानते इसीलिए ठेकेदार के हाथों ठगे गए थे न। 

अब मजदूर बिलकुल बिफर गए, अरे साहब ये क्या बात हुई! बेईमान तो वो ठेकेदार है आप उसको सजा दो, आपने तो हमको ही सजा सुना दी। अब हम इस उम्र में कहाँ ये सब माथापच्ची करेंगे। नहीं नहीं आप तो उस ठेकेदार को बुलाओ उसको डाँटो और उसको नौकरी से निकालो बस हमे तो इतना ही चाहिए। 

मैनेजर साहब बोले, अच्छा चलो मान लो के मैंने उसे नौकरी से निकाल दिया तो क्या गारण्टी हैं के नया ठेकेदार भी ऐसा ही नहीं होगा? जब उसे आप लोगों की कमजोरी का पता चलेगा तो वो भी इसका फायदा नहीं उठाना चाहेगा? आप लोग अगर इस फैक्ट्री का काम छोड़ कर कहीं और काम करने गए तो वहां भी आपके साथ ऐसा ही नहीं होगा। क्योंकि आपकी यह कमी तो आपके साथ ही चलेगी चाहें आप जहाँ भी जाये, चाहे आपके सामने कोई भी हो।आप हमेशा इसी आशंकित ही रहेंगे लेकिन अगर आप साक्षर होंगे तो  आपकी यह समस्या जड़ से ही ख़त्म हो जाएगी। फिर कोई आपको ठग नहीं पायेगा। 

इस कहानी में जो ठेकेदार हैं वह हैं जीवन में आने वाली परिस्थिति 

बूढ़े मजदूर हैं, वे हैं भावनाएँ जो आहत होना जानती हैं, उत्साहित होना जानती हैं पर बदलाव से डरती भी हैं 

जो युवा मजदूर हैं वह है तर्क बुद्धि — जो अपने लिए अभी सबकुछ कैसे ठीक करना है,  बस इतना ही सोचती हैं. 

जो मैनेजर हैं वह हैं विवेक ! 

विवेक को हालात की गाँठ का एक एक धागा खोलना आता हैं 

विवेक को पता हैं के जरूरतें दो तरह की होती हैं — एक होती है felt need यानि वो जरुरत जो महसूस हो रही हैं जैसे मजदूरों को लग रहा था के “ठेकेदार समस्या है — उसे बदल दो” 

और एक होती हैं एक्चुअल नीड यानि वास्तविक समस्या। जिसे देखने के लिए wisdom चाहिए होता हैं। जो मैनेजर देख पाया के टेम्पेररी हल से कुछ नहीं होगा। पूरी तस्वीर देखो और पता लगाओ के वास्तव में काम कहाँ करना हैं। 

अब आपकी जिंदगी में ये बेईमान ठेकेदार कोई भी हो सकता हैं ऑफिस का कोई सहकर्मी, या शायद कोई नजदीकी रिश्तेदार! आपको ऐसा “लगता हैं ” के समस्या उसके होने से हैं पर अगर आप ये मामला अपने विवेक के हाथों में सौंपेंगे तो पाएंगे के  बदलाव की वास्तविक जरुरत कहीं और ही हैं। 

पर विवेक आपको रास्ता तो तब सुझाएगा न जब आपका उस से संपर्क होगा! 

आप विवेक के साथ मीटिंग फिक्स करेंगे कैसे? क्योंकि आप का रास्ता रोके खड़ा होगा मन, भावनाओं की पूरी बटालियन ले कर। उस से पार पाएंगे तो दिमाग अपने तर्कों में उलझा देगा। 

प्रकृति को पता था के भावनाएं और तर्क बुद्धि ये दोनों आपको आसानी से विवेक से मिलने नहीं देंगे। इसीलिए हमारी सहायता के लिए उसने एक खास ख़ुफ़िया नेटवर्किंग की व्यवस्था की हैं। ये ख़ुफ़िया नेटवर्क ऊपर ऊपर से तो अपना काम कुछ और दिखाता हैं पर असल में यह बड़ा पॉवरफुल नेटवर्क हैं जो भावनाओं और तर्क बुद्धि को एक तरफ कर के आपकी मुलाक़ात बिग बॉस यानि विवेक के साथ फिक्स करवा सकता हैं। 

इस ख़ुफ़िया नेटवर्क का नाम क्या हैं और ये कैसे काम करता हैं? अगले आर्टिकल में जानते हैं 🙂 

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मन क्या होता हैं? https://beyondwithin.gunjarikaranka.com/2020/05/01/man-kya-hota-hai/ https://beyondwithin.gunjarikaranka.com/2020/05/01/man-kya-hota-hai/#respond Fri, 01 May 2020 03:19:08 +0000 https://staging.gunjarikaranka.com/?p=568

कौन हैं मन? 

दिल? दिमाग? या इन दोनों से अलग कोई तीसरी चीज…??

मन के साथ जुडी सबसे दिलचस्प बात ये है के इस नाम मन कोई ऑर्गन हमारे शरीर में है ही नहीं लेकिन फिर भी ये मन, हमारे शरीर के हर एक अंग को, हर एक सिस्टम को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। कैसे??

मन अपने आप में कोई ऑर्गन नहीं हैं बल्कि एक सिस्टम का नाम हैं 

ये कुछ ऐसा है जैसे देश की आर्मी होती हैं। जैसे आर्मी अपने आप में कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक सिस्टम का नाम हैं, जैसे हमारी सेना में अलग अलग रेजिमेंट्स है — सिख रेजिमेंट्स, गोरखा रेजिमेंट्स, राजपूत रेजिमेंट ऐसे ही मन के तहत एक पूरी बटालियन काम करती हैं – हार्मोन्स की बटालियन। हार्मोन्स क्या होते हैं ? हमारे शरीर में कुछ ग्रंथियाँ होती है जिनसे स्त्रावित होने वाले रसायनों को हार्मोन्स कहते हैं. ये हार्मोन्स मन के इशारों पर काम करते हैं। 

अगर कमाण्डर मजबूत होगा तो फौज अनुशासन में रहेगी

अपने कमाण्डर के निर्देशों का पालन करेगी और अगर कमांडर कमजोर हुआ, नेतृत्व कमजोर हुआ तो फिर उस दस्ते में जितने लोग हों वे सब कमाण्डर हो जाया करते हैं। ठीक ऐसा ही मन के साथ भी होता हैं। मन क कमजोर हो तो हार्मोन्स मनमाना व्यवहार करने लगते हैं। 

मन — उनका नहीं, बल्कि वे मन के कमांडर बन जाते हैं। 

ये केमिकल्स अंसतुलित हो कर रक्त में उतरते है और शरीर के हर अंग तक पहुँचते है पाचन तंत्र में पहुंचे तो डायबीटीस दे दी… अलसर दे दिया, लंग्स में पहुंचे तो अस्थमा खड़ा कर दिया, गले में पहुंचे तो थायरॉइड दे दिया, दिमाग में पहुंचे तो डिप्रेशन, इन्सोम्निया, एंग्जायटी…. कोई गुस्से से बौखलाया घूम रहा हैं… किसी के मन से अनजाने से डर ही नहीं जाते। कोई रात रात भर सो नहीं पाता तो किसी को आशंकाएँ जकड़े रखती हैं। 

क्या हैं ये सब?

अव्यवस्थित हार्मोन्स। यानि एक ऐसी सेना जिसके कमांडर को नहीं पता के नेतृत्व कैसे करना हैं।

नतीजा थका हुआ दिमाग …थका हुआ शरीर… ये घिर घिर के आती हुई नित नयी बीमारियाँ। एक बीमार मन, एक थका हुआ मन आपके हौंसले को, आत्मविश्वास को, चुनौतियों का सामना सकने के जज्बे को तोड़ कर रख देता हैं। 

अगर मन इतना महत्वपूर्ण हैं तो मन को सँभालने के लिए कोई व्यवस्था तो प्रकृति ने की होगी। शरीर के हर अंग को सँभालने वाले मन को सँभालने वाले मन को सँभालने के लिये हमारे शरीर के पास ऐसा कोई सिस्टम तो होगा? हैं, बिलकुल हैं। वो कौन हैं और उसके होते हुए भी मन क्यों और कैसे अकेला पड़ जाता हैं इस पर अगले आर्टिकल में बात करेंगे।

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दुःख के वेश में आया है…सुख! https://beyondwithin.gunjarikaranka.com/2017/08/01/dukh-ke-wesh-me-aaya-hai-sukh/ https://beyondwithin.gunjarikaranka.com/2017/08/01/dukh-ke-wesh-me-aaya-hai-sukh/#respond Tue, 01 Aug 2017 05:41:04 +0000 https://staging.gunjarikaranka.com/?p=454

अपनी ही उलझनों में फिरें भरमाया..

दुःख के वेश में आया हैं सुख!

मेरे मन तूं पहचान ना पाया…”

‘होनी हो कर रहती हैं कोई शक्ति इसे बदल नहीं सकती’ सुना हैं न ये ?  पर किसको कहते हैं ‘होनी’… किस्मत को? और.. किस्मत मतलब ?

‘जो कुछ हमारे साथ हो रहा हैं… वही तो होती है किस्मत’  अगर बस इतना ही समझते है किस्मत को तो अभी ये परिचय अधूरा हैं !

किस्मत के हाथ में सिर्फ उतना ही हैं- जो हमारे सामने आना हैं – यानि व्यक्ति या परिस्थिति। किसी व्यक्ति के व्यवहार और परिस्थिति के सामने जो कुछ हम कहेंगे और करेंगे उस पर किस्मत का नियंत्रण नहीं हैं ! किस्मत का ये हिस्सा लिखने का अधिकार विधाता ने हमें दिया हैं ।

नियति मेरा संसाधन (resource) हैं। मेरे संस्कार मेरा कच्चा माल (raw material) हैं और मेरा जीवन मेरी फैक्ट्री (factory) हैं। मेरी इच्छा शक्ति मेरा ऊर्जा केंद्र हैं।

मेरे इस कच्चे माल से, अपने उपलब्ध संसाधनों के साथ, अपनी ऊर्जा शक्ति से मेरी इस फैक्ट्री में जो उत्पाद बनेगा वह मेरा भाग्य हैं।

इस सारी प्रक्रिया में कच्चामाल मेरा, ऊर्जा स्त्रोत मेरा, फैक्ट्री मेरी। हाँ, संसाधन कुछ सीमित हैं पर संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग कर सकने वाला दिमाग भी मेरा !

कितना कुछ तो मेरे ही हाथ में हैं। 

सहमत हैं आप ? बहुत से लोगों का जवाब होगा – नहीं ! 

विधाता ने मुझे दिया ही क्या हैं ? मेरी जिंदगी तो ऐसी हैं जैसे सर पे तपता सूरज और पैरों तले जलती जमीन! मैं तो बस लोगों का हरा-भरा लहलहाता जीवन देख कर अपने कर्मों को कोस सकती हूँ…कितनी भी इच्छा-शक्ति हो पर अपने हिस्से की बंजर भूमि पर हरियाली तो नहीं ला सकती।

ठीक कह रहीं है आप। आपको किस्मत ने दी ही नहीं हैं उर्वर जमीन, दी ही नहीं है वैसी जलवायु, वैसा अनुकूल मौसम जो कुछ उगा सकें पर थोड़ा गौर कीजिये की आपको मिला है तेज तपता सूरज! बहुत तीखी हैं न उसकी किरणे, नहीं पनपने देगा वो किसी अंकुर को। पर साध सकती हैं आप उस प्रचंडता को !

सोलर-प्लांट लगा के सोख लीजिये उस तेज को और देखिये कैसा असीम ऊर्जा का भंडार बन जाता है, आपकी मर्जी की प्रतीक्षा में कि कैसे और कहाँ उपयोग करना चाहेंगी आप उसका ! पूरी तरह आपकी मर्जी ! सिर्फ और सिर्फ आपका निर्णय ! अब वो जलता तेज पुंज समस्या नहीं हैं, संसाधन है आपका !

दरअसल हमारी समस्या ये नहीं हैं कि हमें किस्मत ने कुछ नहीं दिया, समस्या ये है की हमें वो नहीं दिया जो हमारे आस-पास वालों को दिया हैं, और हम अपनी सोच की सीमाएं सीमित कर लेते हैं, समेट लेते हैं अपनी आशाओं-अपेक्षाओं के दायरें को सिर्फ वहीँ तक जितना और जैसा हमने देखा हैं। बस वैसा हो हमारा जीवन तो हम नार्मल (normal) और अगर वैसा नहीं हो पाया जीवन तो इसका मतलब हम तो अधूरे रह गए…एक बेचारगी सी ओढ़ लेते हैं या कड़वाहट से भर जाते हैं और नहीं देख पाते की कितना अनोखा उपहार दिया है नियति ने हमें, कैसा सुन्दर संवार सकते हैं हम अपने जीवन को उस से…कैसा कमाल का भाग्य रच सकते हैं ! और सबसे बड़ी बात कितना शानदार उदाहरण बन सकते है कई लोगों के लिए… जिनकी सोच के दायरें को विस्तार दे देंगे हमारें फैसलें । 

जीवन साथी के व्यवहार से आहत हो आप या ऑफिस में गला-काट-स्पर्धा थका रहीं हैं, बड़े होते बच्चे मनमर्जी करने लगे हैं या सेहत साथ नहीं दे रही हैं…आवश्यकता हैं बस सोच की दिशा बदलने की। “कैसा होता आया है” के चश्मे को उतारिये और अपने विवेक की दृष्टि से देखिये। हर समस्या को सुलझाने की सबसे पहले सीढ़ी हैं उस व्यक्ति को, उस स्थिति को स्वीकार करना। स्वीकार करने का अर्थ ये नहीं की बच्चों को अपना नुकसान करते हुए देखते रहेंगे आप, ऑफिस स्टाफ को अपना शोषण करने देंगे या किसी के बेजा दबाव के आगे समर्पण कर देना हैं। पर अगर हर समय यही सोचते रहें की खुद को उनसे कैसे बचाना हैं… तो तनाव ही मिलेगा।

स्वीकार करने का अर्थ है, ये समझना कि वे जिस परिस्थिति में है वहां उनके लिए वैसा सोचना स्वाभाविक हैं। वे आपको परेशान करने के लिए कुछ नहीं कर रहें बल्कि वे तो खुद जूझ रहे हैं। आप कैसे उनकी और अपनी सहायता कर सकते हैं, ये सोचिये ! 

पेड़-पौधों के बारे में जो एक बात हम सभी जानते है कि वे हमें ऑक्सीजन देते हैं पर क्या ऑक्सीजन वो सिर्फ इसलिए देते हैं की हम जीवित रह सकें..?  नहीं, खुद उनका जीवन भी तभी सम्भव है जब वो ऑक्सीजन देंगे ! बहुत बड़ी सीख है इसमें ! 

‘देना’ उपकार नहीं होता ‘देना’ पोषण होता है- स्वयं का पोषण !

औरों को “दे कर”, उनके लिए कुछ कर के, हम अपनी ज़िन्दगी में “जान” डालते हैं और जब हम ये नहीं कर रहे होते हैं तो मुरझाये – बेजान मन को ढो रहें होते हैं बस।

औरो को सहारा देने के लिए हाथ बढा के देखिये साथी खुद ब खुद बनते जायेंगे। अपने अपनों को अपनाइये… उन्हें अपनापन दे कर आप जीत जायेंगे। आप जीतेंगे उनका भरोसा कि आप उन्हें “समझते” हैं ! वो कह पाएंगे आपसे अपने मन की, जब उन्हें यकीन होगा कि आप ठीक वैसा महसूस कर सकते है जैसा उनको महसूस होता हैं… और तब ! आपकी राय मायने रखेगी उनके लिए।

अब है डोर आपके हाथ में ! वह प्रचंड ऊर्जा जो जला रही थी आपको… अब देख रही हैं आपकी ओर की आप दिशा दें उसे।   

याद रखिये सृष्टि के मूल नियम हम सब लिए एक जैसे ही हैं। जो देता हैं, वही पनपता हैं ! 

देना हैं बस प्यार और अपनापन और इन सबसे पहले स्वीकृति। स्वीकार कीजिये उन्हें उनकी सारी उलझनों, सीमाओं के साथ। फिर सुलझाइये…जरूर सुलझ जाएगी ज़िन्दगी 🙂

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